भारत अगर सभ्य राष्ट्र है तो उसके डॉक्टरों पर हमले नहीं होने चाहिये।

”अच्छे बच्चों की तरह अपनी हड़ताल वापस लेने की आप से बिनती है।” पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बेनर्जी के इस अनुरोध के बाद रेसिडेंट डॉक्टरों ने हड़ताल समाप्त कर ली। मुख्यमंत्री ने डॉक्टरों की अनेक मांगों को मान भी लिया है। कोलकाता के सभी सरकारी अस्पतालों में अब तीन सप्ताह के भीतर सुरक्षाव्यवस्था कड़ी की जायेगी। साथ ही, अब हर मरीज़ के साथ अधिकतम दो लोग ही रह सकेंगे। अगर डॉक्टरों पर कोई हमला होता है तो एक बटन दबाने मात्र से स्थानिक पुलीस थाने में जानकारी पहुँच जायेगी और पुलीस को बुलाना आसान हो जायेगा।

एक हड़ताल भले ही समाप्त हो गई हो, वह देशवासियों के लिए एक सबक बने और अब कभी अस्पतालों में किसी डॉक्टर के साथ बदसलूकी की वारदातों को रोकने में सहायक हो ऐसी आशा रखते है।

जब कोई व्यक्ति या समुदाय किसी डॉक्टर पर हमला करता है तब वह सिर्फ एक डॉक्टर की पिटाई का मसला नहीं होता। ऐसी घटनाओं से कई मुद्दे सामने आते है और अंततः स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज में अब भी कई सुधारों की आवश्यकता है। हमने देखा है कि लोग अपनी सेहत का ध्यान रखने में लापरवाही करते है और फिर डॉक्टरों के पास जादू की अपेक्षा रखते है। हफ्ते-हफ्ते तक घर में ही अपने आप दवाई लेते रहते है और फिर डॉक्टर के पास जाते है। इस तरह अपने आप ही स्थिती गंभीर करने के पश्चात डॉक्टर तक पहुँचते है। घर में ही इलाज में विलंब होने के कारण मरीज़ गंभीर स्थिती में होता है। ऐसी अवस्था में अगर अस्पताल में दाखिल करने के बाद थोडे ही समय में मरीज़ की मृत्यु हो जाये तो उनके परिजन डॉक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाते है। ऐसा भी देखा गया है कि कई बार परिजनों को मरीज़ की बीमारी के बारे में भी जानकारी नहीं होती। इसी नासमझी का शिकार होकर वे डॉक्टरो पर टूट पड़ते है और दूसरें मरीजों का भी नुकसान करते है।

सरकारी अस्पतालों में एक डॉक्टर को अधिक संख्या में मरीज़ों का इलाज करना पड़ता है। पिट जाने के कारण वे डॉक्टर स्वयं मरीज़ बन जाते है और दूसरें मरीज़ों का इलाज करने की स्थिती में नहीं रहते। इस तरह उन मरीज़ों का नुकसान हो जाता है। अगर हमलावरों ने अस्पताल के उपकरणों को नुकसान कर दिया हो तो मरीज़ों का इलाज हो नहीं पाता। इस तरह अस्पताल में होने वाले हमलों के कारण अनेक रूप में नुकसान झेलना पड़ता है।

डॉक्टर जब हड़ताल करता है तब लोग दूसरें मरीज़ों का इलाज नहीं होने का मुद्दा उपस्थित करते है, लेकिन जब किसी डॉक्टर पर हमला हो रहा हो तब उस के खिलाफ़ आवाज क्यों नहीं उठाते। डॉक्टर भी आखिर इंसान होते है। उन्हें भी अपनी सुरक्षा के लिए सोचना पड़ता है। क्या आप को लगता है कि अगर डॉक्टर इतने दिन हड़ताल नहीं करते और इस बात पर इतना बवाल नहीं मचता तो क्या ममता बेनर्जी अच्छी मुख्यमंत्री की तरह उनसे मंत्रणा करके आंदोलन समाप्त करने की बिनती करती?

दरअसल डॉक्टर राष्ट्र की संपत्ति होते है। भारत अगर सभ्य राष्ट्र है तो उसके डॉक्टरों पर हमले नहीं होने चाहिये।

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